जाने कहां गए वो दिन...
मंगरू की नई दुल्हन के साथ मैं भी कानपूर से आगरा आई। इतने
लंबे सफर और एक ही गा़ड़ी में पलंग,तोसको,फ्रीज,कुलर आदि के बीच फंसे होने के बाद
भी मुझे थकान नहीं महसूस हो रही थी। मैं तो यही सोच कर खुश हो रही थी कि आखिरकार इतने
लंबे समय
तक बढ़ई की उस धूल-धक्कड वाली दुकान से छुटकारा मिल ही गया। बड़ा ठोक-ठाक करता था,
रोज नई-नई कुर्सियां बनाता था। नए-नए लोग आते नई-पुरानी कुर्सियों को खरीद कर ले
जाते। मुझे लगता मैं यू ही कोने में धूल खाती रहूंगी पर धन्यभाग्य की देर से ही
सही इतने बड़े घर में नई बहुरीया के साथ मान-सम्मान के साथ आने का मौका तो मिला।
घर में लाई गई तो मैं
भी मंगरू की नई बहुरियां की तरह बहुत इठला रही थी। आंचल तो नहीं था पर उसकी तरह
शर्माने की कोशिश कर रही थी। मंगरू के पापा बोल रहे थे अरे इस कुर्सी को यहां,
उसकी मां बोल रही थी, इसे रसोई के साथ लगे टेबल के पास लगाओ, पर मंगरू ने कहा इस
कुर्सी के साथ और भी 5 कुर्सियां हैं और एक मेज है जो बैटके में लगेगी सबने मंगरू
की बात रखी और मैं अपनी बिरादरी वालों के साथ बैठके में सज गई।
नए-नए लोगों की खातिरदारी जहां एक ओर मंगरू का परिवार कर रहा
था वहीं मैं भी उनकी खातिरदारी में बिछी हुई थी। कुछ 5-6 दिनों बाद मंगरू के विवाह
का उत्सव खत्म हुआ। अब घर में गिन कर 5 लोग रह गए थे। दो मंगरू के माता पिता, एक
उसका भाई, एक नई नवेली बहुरिया और एक वो खुद। सब रात में खाना पिना होने के बाद
बैठके में आते और मैं उत्साहित होकर घर के मालिक यानी मंगरू के पिता के स्वागत में
बिछ जाती। मंगरू
के पिता भी मुझी पर ही बैठते, ऑफिस से छुट्टी वाले दिन भी वे मुझे ही अपना आसन
बनाते। इसलिए मेरी सजातियों के बीच मेरा रौब था। मैं उनमें श्रेष्ट थी। मंगरू के
पापा की तरह ही मैं अपने आपको अपनी सजातियों की मुखिया मानती थी। समय से साथ साथ
मेरी महत्ता बढ़ रही थी।
इसी दौरान मंगरू के घर खुशखबरी आई बहुरिया को बच्चा होने वाला
था। कुछ ही महीनों बाद बहुरिया को एक गोलू मोलू बबुआ हुआ। अब तो मेरा रौब और बढ़
गया था क्योंकि अब बाबूजी घऱ के चिराग के साथ मेरे उपर बैठते थे। मेरी बिरादरी की
दूसरी कुर्सियां इससे बहुत चिढ़ती थीं।
कुछ समय और गुजरा मंगरू का बेटा अब बडा हो रहा था,11-12 महीने
का हो गया था। एक दिन मुझ पर बैठा और मुझे गिला कर दिया, बहुरिया ने मुझे अपने
हाथों से पोंछा मेरा रौब सांतवे आसमान पर पहुंच गया। अब तो मंगरू के बेटे का नियम
बन गया था वह खेलते कूदते मुझ पर पानी गिरा देता कभी अपना खाना मुझे ही खिला देता।
पहले तो यह सबकुछ मुझे भाता था, मेरा भाव जो बढ़ जाता था। लेकिन अब धीरे-धीरे मुझे
परेशानी होने लगी थी, कई बार मैं गिली रह जाती, इसी कारण घर के मुखिया मुझे छोड़
किसी और को अपनी स्थाई आसन बना लिया था।
मंगरू के बेटे की शैतानी बढ़ती जा रही थी और एक दिन तो हद हो
गई वो खेलता-खेलता मुझ पर चढ़ा और गिर गया। परिवार के लोग उसे मनाने में जुट गए और
मुझे एक कोने में रख दिया गया। अब भी मंगरू का बेटा मुझपर चढ़ता लेकिन दीवार से
सटे होने के कारण वो मुझपे से गिरता नहीं था। अब वो बीना रोक-टोक के मुझपर कूदता
फांदता था अब मैं कमजोर होने लगी थी। एक दिन बाबूजी ने मुझपर एक लोटा पानी रखा जो
मंगरू से लूढ़क गया। मैं गिली हो गई, मंगरू का भाई ने मुझे सूखने के लिए छत पर रख
दिया। अब मानो मेरी किसी को सूध ही नहीं थी। अब मैं छत की शोभा बढ़ा रही थी। जाड़ा
गर्मी बरसात मुझे छत पर ही काटना पड़ा। मेरे अस्थी पंजर कमजोर होने लगे। मेरी
सहयोगी कुर्सियां कभी-कभार छत पर आती थीं, लेकिन मालिक के साथ जिन्हें मंगरू का
बेटा बैठने के बाद उठा कर घर के अंदर कर देता, अब वह 8 साल का हो गया था।
धूप-पानी हवा के झोंके के बीच खड़ी मैं फिर से बढ़ई की उस
दुकान के बारे में सोचने लगी जो यहां से कहीं बेहतर थी।
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